Live11news: भारतीय राजनीति में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को लंबे समय तक “काम न समझने” वाला नेता बताने की कोशिश की गई। उनकी छवि को धूमिल करने के लिए कटाक्ष, प्रचार और व्यक्तिगत हमले किए गए। लेकिन समय ने यह दिखा दिया कि राजनीति में धैर्य, निरंतरता और मुद्दों पर स्पष्टता अंततः अपनी जगह बना ही लेती है।
भारत जोड़ो यात्रा से लेकर संसद के पटल तक राहुल गांधी ने बेरोज़गारी, महंगाई, सामाजिक न्याय, संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती और लोकतांत्रिक मूल्यों जैसे गंभीर विषयों को मुखर होकर उठाया। उनकी बातों में जमीन की सच्चाई, आम जन की पीड़ा और भविष्य की चिंता साफ़ दिखाई दी। यही कारण है कि आज देश का बड़ा वर्ग उनकी बातों को पहले से अधिक गंभीरता से समझ रहा है।
जहाँ एक समय आलोचनाएँ हावी थीं, वहीं आज संसद और सार्वजनिक विमर्श में भारतीय जनता पार्टी के कई सांसदों के पास उनके तर्कों का ठोस जवाब नहीं दिखता। राहुल गांधी ने शोर-शराबे से नहीं, बल्कि मुद्दों की निरंतर प्रस्तुति से अपनी राजनीतिक परिपक्वता साबित की है।
यह भी सच है कि जिस परिवार ने स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आधुनिक भारत के निर्माण तक देश के लिए बलिदान दिए, उस वंश को राजनीति का पाठ पढ़ाने की कोशिश कुछ लोगों ने की। लेकिन आज वही लोग अपने आरोपों का उत्तर पा चुके हैं। राहुल गांधी की राजनीति विरासत मात्र नहीं, बल्कि संघर्ष और सीख का परिणाम है।
आज देश के कोने-कोने में यह चर्चा है कि यदि परिस्थितियाँ और लोकतांत्रिक नियम अवसर देते हैं, तो भविष्य में देश का नेतृत्व किस दिशा में जाएगा। बड़ी संख्या में देशवासी राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में देखने की उम्मीद व्यक्त कर रहे हैं।
एक ऐसे नेता के रूप में जो संवाद, संवेदनशीलता और संविधान की आत्मा को साथ लेकर चले।
यह उम्मीद ही लोकतंत्र की ताकत है, जहाँ आलोचना से उभरकर विचारों की जीत होती है, और समय के साथ जनता अपने नेता को परखती है।
मोहम्मद सेराज की रिपोर्ट,
