पिछले कुछ समय से सीटों के बंटवारे और स्थानीय नीति जैसे मुद्दों पर JMM और कांग्रेस के बीच तनातनी की खबरें आ रही थीं। अब यह चर्चा तेज है कि हेमंत सोरेन और बसंत सोरेन ने आगामी चुनावों के मद्देनजर कांग्रेस के साथ अपने रास्ते अलग करने का मन बना लिया है।
अचानक लिए गए इस फैसले के पीछे के संभावित कारण:
सीट शेयरिंग: आगामी विधानसभा और स्थानीय चुनावों में सीटों के तालमेल पर सहमति न बन पाना।
क्षेत्रीय प्राथमिकता: JMM का मानना है कि झारखंड में वे “बड़े भाई” की भूमिका में हैं और कांग्रेस की कुछ मांगें उनके क्षेत्रीय जनाधार के लिए सही नहीं हैं।
आंतरिक रणनीति: बसंत सोरेन की सक्रियता और पार्टी के भीतर कैडर को मजबूत करने के लिए स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने का दबाव।
राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे की प्रतिक्रिया
इस खबर के सामने आने के बाद दिल्ली स्थित कांग्रेस आलाकमान ने भी मोर्चा संभाल लिया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी ने गठबंधन की मजबूती पर जोर देते हुए अपनी बात रखी है:
राहुल गांधी का रुख: “हमारा उद्देश्य भाजपा की विचारधारा को रोकना है। झारखंड में गठबंधन का आधार जनता की भलाई और लोकतंत्र को बचाना है। अगर कुछ मतभेद हैं, तो उन्हें बातचीत से सुलझा लिया जाएगा।”
मल्लिकार्जुन खड़गे का बयान: “झारखंड मुक्ति मोर्चा हमारा पुराना और विश्वसनीय साथी रहा है। गठबंधन तोड़ने की बातें फिलहाल अटकलें हो सकती हैं, हम सोरेन जी से संपर्क में हैं। एकता ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है।”
सियासी समीकरणों पर असर
अगर यह गठबंधन टूटता है, तो झारखंड की राजनीति में निम्नलिखित बदलाव आ सकते हैं:
त्रिकोणीय मुकाबला: राज्य में भाजपा, JMM और कांग्रेस के बीच मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है, जिससे मतों का बिखराव होगा।
छोटे दलों की अहमियत: ऐसी स्थिति में छोटे क्षेत्रीय दल और निर्दलीय उम्मीदवार ‘किंगमेकर’ की भूमिका में आ सकते हैं।
भाजपा को लाभ: विपक्षी एकता में दरार का सीधा फायदा भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है, जो पहले से ही आक्रामक चुनावी मोड में है।
निष्कर्ष: फिलहाल आधिकारिक तौर पर दोनों पार्टियों की ओर से अंतिम मुहर लगना बाकी है, लेकिन सोरेन परिवार के इस कड़े रुख ने इंडिया गठबंधन (I.N.D.I.A. Alliance) की स्थिरता पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
