आज के पत्रकारों को पीत पत्रकारिता से बचने की आवश्यकता।
हजारीबाग: भारत में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बाद मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता हैं. मीडिया किसी भी राष्ट्र के लोकतंत्र के लिए उसकी रीढ़ मानी जाती है. लेकिन पीत पत्रकारिता (येलो जर्नलिज्म) के बढ़ते प्रभाव लोकतंत्र के लिए खतरा है. पाठकों को लुभाने के लिए झूठी अफवाहों, आरोपों प्रत्यारोपों, प्रेम संबंधों आदि से संबंधित सनसनीखेज समाचारों से संबंधित पत्रकारिता को पीत पत्रकारिता कहा जाता है. इसमें सही समाचारों की उपेक्षा करके सनीसनी फैलानेवाले समाचार या ध्यान खींचनेवाला शीर्षकों (हेडिंग) का बहुतायत में प्रयोग किया जाता है. इसे समाचार पत्रों की बिक्री बढ़ाने, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की टीआरपी, चैनलों में व्यूज बढ़ाने का घटिया तरीका माना जाता है. इसमें किसी समाचार खासकर ऐसे सार्वजनिक क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति द्वारा किया गया कुछ आपत्तिजनक कार्य, घोटाले आदि को बढ़ा चढ़ाकर सनसनीखेज बनाया जाता है. किसी सूचना या विचार को जन-जन तक पहुंचाना, समय और समाज के संदर्भ में सजग रहकर नागरिकों में दायित्व बोध कराना, समाज में घटित घटनाओं व उनसे संबंधित विचारों से नागरिकों को अवगत कराने की कला ही पत्रकारिता हैं. सूचना परिवर्तन लाने का नाम हैं. सूचना विकास का आधार बनती हैं. पीत पत्रकारिता समाज को नुकसान पहुंचाती हैं. पत्रकारिता के विकास के साथ साथ कई विकृतियों ने जन्म लिया, जिसमें पीत पत्रकारिता भी एक हैं. यह बिलकुल स्पष्ट है कि जब-जब पत्रकारीय सिद्धांतों और आचार संहिता को ताक पर रखा गया तो यह पीत पत्रकारिता के दायरे में आया. शुरुआती दौर में यह प्रभावी रूप से सामने नहीं आया, क्योंकि आज की तरह जनसंचार माध्यमों में लोगों तक सूचना पहुंचाने की होड़ नहीं मची थी और न ही प्रबंधकीय तंत्र का विज्ञापन को लेकर इतना दबाव था.
यूरोप में 17वीं शताब्दी में हुई औद्योगिक क्रांति के बाद पीत पत्रकारिता का उद्भव हुआ. मुद्रण की नई तकनीक ने समाचार पत्रों के प्रकाशन में क्रांतिकारी परिवर्तन किया. एक समय में हजारों प्रतियों की छपाई ने पत्र पत्रिकाओं के प्रसार बढ़ाने में अहम योगदान दिया. इसे भांपते हुए कई समाचार संगठनों में आगे निकलने की होड़ मच गई. समाचार प्रस्तुतीकरण से जुड़े नये-नये प्रयोग शुरू हुए, जिसने पीत पत्रकारिता को बढ़ावा दिया. 19वीं शताब्दी के अंतिम दशक में अमेरिका में जोसेफ पुलित्जर की स्वामित्व वाली न्यूयार्क वर्ल्ड और विलियम रैंडोल्फ हटर्ज की न्यूयार्क जर्नल के बीच प्रसार संख्या को लेकर मची होड़ ने पीत पत्रकारिता को पूरी तरह स्थापित किया. दोनों पत्रों ने समाचार के तथ्यों के तोड़ मरोड़ और सनसनीखेज प्रस्तुतीकरण पर काफी ध्यान दिया गया. इस दौरान पुलित्जर ने एक प्रयोग किया. उन्होंने येलो किड नाम से एक कार्टून का प्रकाशन शुरू किया, जो उस दौर में काफी लोकप्रिय हुआ. रिचर्ड एफ आउटकॉल्ट द्वारा रचित इस कार्टून ने पीत पत्रकारिता शब्द का प्रचलन कराया. पुलित्जर के प्रतिद्वंद्वी हर्स्ट ने इस कार्टून की लोकप्रियता को भांपते हुए कार्टूनिस्ट रिचर्ड एफ आउटकॉल्ट को धन बल पर न्यूयार्क जर्नल से जोड़ लिया. पुलित्जर ने भी एक नए कार्टूनिस्ट जार्ज ल्यूक को नियुक्त कर येलो किड कार्टून को जारी रखा. इसके बाद धन बल से पत्रकारों को प्रभावित करने का दौर शुरू हुआ. दोनों समाचार पत्रों ने प्रसार संख्या बढ़ाने के लिए हर हथकंडे अपनाए.
पीत पत्रकारिता का भयावह रूप तब देखने को मिला, जब न्यूयार्क वर्ल्ड और न्यूयार्क जर्नल ने अमेरिका और स्पेन के बीच युद्ध को हवा दी. दोनों पत्रों ने इसे प्रसार संख्या बढ़ाने और राष्ट्रीय स्तर पर अपना प्रभुत्व कायम करने के अवसर के रूप में लिया. लगातार ऐसे समाचारों का प्रकाशन हुआ, जिसने युद्ध को अवश्यंभावी बना दिया. पीत पत्रकारिता की औपचारिक शुरुआत का यह दौर आने वाले समय के लिए एक खतरा बन गया। प्रथम विश्वयुद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध में भी पत्रकारिता का जमकर दुरुपयोग हुआ. जनसमूह को अपने पक्ष में करने के लिए संदेशों के साथ खिलवाड़ आम बात रही. इसके लिए पत्रकारिता के सभी साधनों पर नियंत्रण कर कई देशों को युद्ध करने पर मजबूर किया गया, जबकि कई देशों पर युद्ध थोपा गया. यह दौर आगे भी चलता रहा.
जनसंचार के नए माध्यमों रेडियो, टीवी और न्यू मीडिया के आगमन के बाद प्रतिस्पर्धा का एक नया दौर शुरू हुआ, जिसने पीत पत्रकारिता को बढ़ावा दिया. पहले सिर्फ पत्र पत्रिकाओं के बीच प्रसार संख्या और विज्ञापन को लेकर होड़ थी, लेकिन रेडियो के बाद टीवी और फिर टीवी के बाद न्यू मीडिया के आने से यह होड़ काफी बढ गई. पत्रकारिता का परिदृष्य एकदम बदल गया. सबसे तेज और सबसे अलग दिखने वाले इस माहौल में पत्रकारीय भूल आम बात हो गई, जिससे पीत पत्रकारिता को हर माध्यमों के जरिए पनपने का अवसर मिला. आज के पत्रकारों को पीत पत्रकारिता से बचने की आवश्यकता हैं, ताकि लोगों में मीडिया की विश्वनीयता बनी रहे।
मो० तसलीम, बीजेएमसी छात्र, मार्खम कॉलेज हजारीबाग,
