टंडवा:औद्योगिक नगरी के रूप में विख्यात टंडवा के आम जनमानस की जिंदगी कफन हसे कीमत तक में सिमटकर रह गई है। सीसीएल के मगध और आम्रपाली के अलावा पिपरवार और चट्टी बारियातू कोल खनन क्षेत्र के हजारों वाहनों ने पिछले एक दशक में करीब बारह सौ से अधिक बेगुनाह लोगों की जाने ले ली है। सिर्फ वर्ष 2024 के पिछले पांच महीने तक एक दर्जन से अधिक बेगुनाह लोगों के खून से टंडवा की सड़कें लाल हो गई हैं। इन हादसों के बाद ट्रांसपोर्टर और सीसीएल प्रबंधन के साथ पदाधिकारी व जनप्रतिनिधि कफन की कीमत तय कर आपाधापी में सड़क पर बिलखते परिवार को हटवा देते हैं। इन हादसों के जितने जिम्मेदार सीसीएल प्रबंधन और ट्रांसपोर्टर हैं उससे कहीं ज्यादा यहां के जनप्रतिनिधि। जिन्होंने हजारों परिवारों के चिराग को बुझने के बाद भी कोई ठोस पहल नहीं किया। जिसका नतीजा यह रहा कि हजारीबाग जिले के चट्टीबारियातू परियोजना कर कोयला भी बड़कागांव हजारीबाग मुख्य पथ होते हुए भेजने के बजाय टंडवा-सिमरिया मुख्य पथ से भेजा जाने लगा। जिसके कारण मुख्य सड़क पर एक हजार से अधिक वाहनों की संख्या बढ़ गई। लिहाजा वाहनों को संख्या बढ़ाने के साथ हादसों में भी इजाफा हुआ और परिवारों के चिराग बुझने में थी। विकास के नाम पर विनाश की पटकथा से के कोयले से चले ही देश रौशन होता हो और बड़ी बड़ी कंपनियों व ट्रांसपोर्टरों का विकास होता हो, पर यहां के आम जनमानस के लिए इसी कोयले से विनाश की पटकथा लिखी जा रही है। एक ओर जहां बड़ी-बड़ी कंपनियों जैसे नकास ,प्रगति समेत दर्जनों कंपनियों और कोयले के ट्रांसपोर्ट में लगे ट्रांसपोर्टर करोड़ों रुपए रोजाना छाप रहे हैं।वहीं दूसरी ओर दो जून की रोटी के लए भागते आम गरीब के लिए बने आम सड़क पर कोल वाहनों ने कब्जा जमा लिया है।धूल-गर्दे को फांकने के साथ यहां के आम लोग कोल वाहनों के पहिए में पिसकर जान गवां रहे हैं।
Author: Shamsher Editor in chief
14/08/1980
