- झारखंड सहित दूसरे राज्यों में ऊर्जा खतरा
- रोज़गार पर संकट के बादल
- 800 मेगावाट के नये पावर प्लांट की भविष्य की परियोजना अंधेरे में
- 3 महीना से चल रहे आंदोलन का खतरा
झारखंड में गहराता ऊर्जा संकट, बोकारो थर्मल में बंदी का खतरा
तीन महीना से जारी आंदोलन से ठप होने की कगार पर 500 मेगावाट का प्लांट, नई 800 मेगावाट परियोजना पर भी खतरे की घंटी
बोकारो थर्मल: दामोदर वैली कॉर्पोरेशन के बोकारो थर्मल स्थित नूरी नगर ऐश पौंड में पिछले तीन महीना से जारी गतिरोध अब गंभीर ऊर्जा संकट का रूप ले चुका है। ‘बेरमो हाईवा कोयलांचल एसोसिएशन’ और विस्थापितों के बैनर तले चल रहा आंदोलन न केवल 500 मेगावाट के पावर प्लांट को बंदी की स्थिति में पहुँचा रहा है, बल्कि भविष्य की 800 मेगावाट की नई अत्यंत आधुनिक से लेश पावर परियोजना पर भी अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं।
राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रशासनिक उदासीनता ने बिगाड़े हालात
आंदोलनकारी ऐश ट्रांसपोर्टिंग रेट में मनमानी बढ़ोतरी और ओवरलोडिंग की अनुमति की मांग पर अड़े हैं। डीवीसी प्रबंधन का कहना है कि ट्रांसपोर्टिंग दरें राष्ट्रीय स्तर की निविदा प्रक्रिया से तय होती हैं, जिसमें स्थानीय और बाहरी कंपनियों को समान अवसर दिया जाता है।
डीवीसी बोकारो थर्मल के वरीय जीएम सुशील कुमार अरजरिया ने बताया कि इतने लंबे समय से राष्ट्रीय महत्व की परियोजना ठप रहने के बावजूद प्रशासन या पुलिस-प्रबंधन की कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक निष्क्रियता ने आंदोलनकारियों का मनोबल और बढ़ा दिया है।
500 मेगावाट उत्पादन ठप होने का खतरा, 54 मजदूरों की रोज़ी पर संकट
डीवीसी का ‘ए’ पावर प्लांट अगर ठप हो गया, तो इससे झारखंड सहित अन्य राज्यों की बिजली आपूर्ति पर भी असर पड़ेगा। ऐश पौंड में काम कर रहे लगभग 54 मजदूरों के समक्ष रोज़गार का संकट खड़ा हो गया है।
800 मेगावाट की नई परियोजना पर ग्रहण का खतरा
डीवीसी के पुराने ‘बी’ पावर प्लांट को स्क्रैप कर उसी जगह और आसपास की कॉलोनी क्षेत्र में 800 मेगावाट की नई परियोजना लगाने की योजना थी। सैकड़ों स्थानीय युवाओं के लिए स्थायी रोज़गार का जरिया बनने वाली थी।
लेकिन लगातार जारी यह गतिरोध और प्रशासनिक विफलता केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर नकारात्मक संदेश दे रहे हैं। उद्योग जगत में भी यह धारणा बन रही है कि स्थानीय राजनीति और अस्थिर माहौल बड़े निवेश के लिए खतरा बन सकते हैं।
“अब नहीं जागे तो पछताना पड़ेगा”
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह आंदोलन जल्द खत्म नहीं हुआ, तो 500 मेगावाट का चालू प्लांट बंद हो सकता है और 800 मेगावाट की प्रस्तावित परियोजना भी स्थगित हो सकती है। इससे न केवल ऊर्जा उत्पादन घटेगा बल्कि पूरे क्षेत्र के औद्योगिक विकास पर भी गहरा असर पड़ेगा।
सकारात्मक समाधान की दरकार
परिस्थिति को देखते हुए डीवीसी प्रबंधन और आंदोलनकारी संगठनों को संवाद के माध्यम से समाधान तलाशना होगा। प्रशासन को सख्ती दिखाते हुए अवैध गतिरोध को समाप्त कर बिजली उत्पादन बहाल कराना चाहिए।
स्थानीय नेताओं और संगठनों को यह समझना होगा कि क्षेत्र के दीर्घकालिक हित में सकारात्मक पहल ही एकमात्र रास्ता है। अगर यह अवसर खो गया, तो आने वाले वर्षों में क्षेत्र के पास केवल पछतावा ही बचेगा।
