दहशत और प्रदूषण के दोहरे मार झेलने के लिये ग्रामीणों को कौन कर रहा है विवश!? क्या पूर्ववत फर्जीवाड़े का सहारा लेकर दबा दी जायेगी प्रतिकार करने वालों की आवाज़!?
टंडवा (चतरा) एनटीपीसी के चट्टी- बारियातु कोल परियोजना से उत्पादित कोयले की रेलवे लाईन से ढुलाई हेतु ट्रांसपोर्टिंग सड़क निर्माण को लेकर प्रबंधन के सहयोग में प्रशासनिक अधिकारी भी खूब पसीना बहा रहे हैं। 23 जुलाई को वृंदा मोड़ में सार्वजनिक आमंत्रण को अधिकांशत: भू-रैयतों ने दरकिनार कर उन्हें तगड़ा झटका दिया है। बताया जाता है कि सिसई मोड़ से शिवपुर रेलवे साइडिंग तक सड़क निर्माण के लिए लगभग 7करोड़ रुपए का डीपीआर तैयार है। वहीं कुछ लोगों की मानें तो उक्त कार्य से पहले पर्यावरणीय स्वीकृति (अनापत्ति) आवश्यक है जो ग्रामीणों द्वारा सहमति नहीं दिये जाने से अबतक किसी को भी प्राप्त नहीं है। बताया जाता है कि कई बार विभागीय प्रयासों को ग्रामीण विफल करते रहे हैं, जबकि संबंधित अधिकारी लोगों में व्याप्त भारी अविश्वास को नहीं पाट सके।
आखिर, ग्रामीणों में अविश्वास का क्या है मूल वजह!?
विभिन्न परियोजनाओं में राजस्व अधिकारियों की उदारता और भू-रैयतों के मामले में उदासीनता प्रथमदृष्टया अविश्वास का मूल वजह नजर आता है। वैसे प्रसिद्ध कहावत है – दूध का जला मठ्ठा भी फूंक कर पीया जाता है। बीते दिनों से सबक लेकर लोग गलतियों की पुनरावृत्ति नहीं करना चाहते। विदित हो वृंदा – सिसई कोल परियोजना में हीं राजस्व अधिकारियों व परियोजना प्रबंधन द्वारा बरती गई भारी धांधली आज भी लोगों को नासूर बन कर चुभता रहा है। दूसरी ओर आम्रपाली परियोजना प्रबंधन द्वारा रेलवे लाइन के निर्माण में चंद दूरी में स्थित सेरनदाग में अनापत्ति लेने के लिए फर्जीवाड़ा करने के प्रयासों वाला दावा काफ़ी सुर्खियां बटोर चुका है।ग्रामीणों के तमाम दावों को दरकिनार कर 17 वीं बार किया गया प्रयास भी किसी से छुपा नहीं है। यही वजह है कि खाशकर राजस्व अधिकारियों के किसी भी दावों में लोगों को कोई दम नजर नहीं आता, उनके प्रति भारी अविश्वास है।
ट्रांसपोर्टिंग सड़क के निर्माण से लोगों में जीवन और जीविका तबाह होने की आशंका।
कोल परियोजनाओं से निकलने वाले वाहनों द्वारा हजारों जिंदगियों को निगलते लोगों ने काफ़ी करीब से देखा है। अबतक मुआवजे के लिये सड़कों पर शवों को रखकर याचना करते परिजन और उसपर भी पिछले एक दशक से तमाशबीन सियासत का चरित्र आइने की तरह यहां साफ है। प्रदूषण से पीढ़ियों तक स्वास्थ्य व खेती-बारी पर नकारात्मक प्रभावों का लोग गहरा मूल्यांकन करने लगे हैं।
एनटीपीसी द्वारा क्या भूमि के बदले जमीन देने वालों को दी जायेगी स्थाई नौकरी और विस्थापन का लाभ!?
अगर उक्त शर्तें शामिल हो तो मुझे लगता है लोग मंथन- चिंतन करेंगे। अन्यथा, जैसा लग रहा है हजारीबाग जिले से उत्पादित कोयले की ढुलाई चतरा से करने का पूर्ववत सिर्फ उपयोग नहीं होने दी जाएगी। एनटीपीसी व अन्य खनन कंपनियां रॉयल्टी के पैसे से विकास करे हजारीबाग का और विनाश के लिये टंडवा को बलि का बकरा बनाने वालों के मंसूबे हर हाल में विफल कर दिया जायेगा।लोग एनटीपीसी प्रबंधन से जानना चाह रहे हैं कि रेलवे लाइन तक कोयले की आपूर्ति के लिये परियोजना क्षेत्र से कटकमदाग तक सड़क बनाकर या कन्वेयर से हीं आपूर्ति का प्लान वे क्यों नहीं बना लेते!? जबकि दोहरा मार झेलने के लिये लोगों को आखिर क्यों झोंकना चाह रहा है चतरा जिला प्रशासन!?
सकारात्मक प्रयास की उम्मीद, विफल होने पर हाइकोर्ट में याचिका करेंगे दाखिल: भू-रैयत।
पिछले डेढ़ दशक से जिस तरह ग्रामीणों ने एक जुटता के बल पर कोल खनन के लिये पहुंचने वाले कई कंपनियों के पांव नहीं जमने दिये वैसा हीं हश्र इस ट्रांसपोर्टिंग सड़क निर्माण में भी होगा। सड़क निर्माण में हाथ-पांव मार रहे एनटीपीसी प्रबंधन व चतरा जिला प्रशासन की गतिविधियों पर नज़र है। जरुरत पड़ने पर उच्च न्यायालय में शीघ्र हीं याचिका दाखिल की जायेगी।
कामेश्वर गुप्ता की रिपोर्ट,
