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कबीर ज्ञान मंदिर में चल रहे दो दिवसीय श्रीमद् भागवत गीता जयंती की हुई पूर्णाहुति

 

 

गिरिडीह — श्री कबीर ज्ञान मंदिर गिरिडीह में श्रीमद्भागवत गीता ज्ञानयज्ञ के द्वारा आयोजित श्रीमद्भागवत गीता जयंती की पूर्णाहुति की गई। सद्गुरु मां ज्ञान के सान्निध्य में हजारों श्रद्धालुओं ने श्रीमद्भागवत गीता के श्लोकों द्वारा यज्ञ हवन किया। तत्पश्चात विशाल भंडारे का आयोजन किया गया।

गीता में कर्म की प्रधानता बताई गई है। गीता में यज्ञार्थ कर्म करने की प्रेरणा दी गई है। यज्ञार्थ कर्म का अर्थ है कि आपके कर्म शास्त्र सम्मत हो। कर्म के साथ साथ आपकी वाणी, आपके आचार–विचार शास्त्र सम्मत हो।

कर्मो में अहंकार का पूर्णतः अभाव हो। मैंने किया, मैं कर्ता हूं , ऐसा भाव अहंकार को उत्पन्न करता है। गीता के अनुसार हमें अपने कर्मो में इतना सावधान रहना चाहिए कि हमसे कभी ऐसा कर्म न हो जिससे किसी भी प्राणी को कष्ट हो। किसी भी कर्म को करने से पहले अपने कर्मो को गीता के तराजू में तौलना चाहिए। आपका कर्म राग और द्वेष से प्रेरित न होकर शास्त्र से प्रेरित हो।

श्रीमद् भागवत गीता कहती है की किया हुआ कर्म लौट कर आता है। हम किसी के प्रति जैसा कर्म करते हैं ईश्वर के विधान में वह पुनः हमारे पास फल के रूप में आता है। गीता में भगवान ने कर्मों के तीन प्रकार तामसी राजसी और सात्विक बताया है, जिसमें सबसे उत्तम कर्म सात्विक कर्म है, हमारे कर्म ऐसे हो जिससे हमें स्वयं प्रसन्नता मिले और हम दूसरों को भी प्रसन्नता ही बांटे।

यज्ञ की पूर्णाहुति में सद्गुरु मां ज्ञान की सानिध्य में सभी उपस्थित श्रद्धालु ने गीता ज्ञान यज्ञ और गीता पाठ के पुण्य फल को अपने राष्ट्र के उन्नति के लिए अर्पित किया। सद्गुरु मां ज्ञान ने कहा कि जब हमारा राष्ट्र समृद्ध और सशक्त होगा तभी हम सभी सशक्त होंगे। जितना हमें अपने परिवार के प्रति कर्तव्य है उतना ही कर्तव्य हमें अपने राष्ट्र की प्रति भी है। सद्गुरु में सद्गुरु मां ज्ञान ने कहा इस तरह के कार्यक्रम का आयोजन हमें अपने भावी पीढ़ियां में अपने संस्कृति के प्रति गौरव बोध को जगाएगा। इस तरह के कार्यक्रम का आयोजन तभी सफल होगा जब हम ईश्वर के द्वारा बनाए गए मानव के संविधान “श्रीमद्भागवत गीता” को जन-जन तक पहुंचाने का पुनीत कर्म करेंगे। एक एक व्यक्ति का कर्तव्य है कि हम गीता के ज्ञान को स्वयं में भी धारण करें और इसे जन-जन तक पहुंचाने का पुण्य कर्म भी करें।

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