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सादगी की मिसाल: बोकारो में बिना बैंड-बाजे और आतिशबाजी के संपन्न हुआ निकाह, समाज को दिया बड़ा संदेश

बोकारो: आधुनिकता के दौर में जहाँ शादियाँ दिखावे और फिजूलखर्ची का पर्याय बनती जा रही हैं, वहीं बोकारो जिले में एक ऐसी बारात देखने को मिली जिसने अपनी सादगी से सबका दिल जीत लिया। बिना किसी ताम-झाम, न बैंड-बाजा और न ही आतिशबाजी—इस अनोखी बारात की चर्चा आज पूरे इलाके में हो रही है।

कथारा से मानगो बस्ती पहुंची ‘आदर्श बारात’

यह मामला बोकारो के कथारा क्षेत्र इस्लाम अंसारी का है, जहाँ से बारात मानगो बस्ती जलाल अंसारी के यहां आई थी। आमतौर पर बारात के आगमन पर होने वाले शोर-शराबे और पटाखों के शोर के विपरीत, यह बारात बेहद शांत और गरिमामय तरीके से पहुंची। दूल्हा और बाराती बिना किसी फिजूलखर्ची के शरीयत के दायरे में रहकर निकाह की रस्मों के लिए पहुंचे।

धर्मगुरुओं की मुहिम का दिख रहा असर

गौरतलब है कि मुस्लिम धर्मगुरु लंबे समय से समाज में जागरूकता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं कि निकाह को सादगी से निभाया जाए।

शरीयत के मुताबिक:

दिखावे से परहेज: बैंड-बाजा और नाच-गाने पर रोक।

फिजूलखर्ची पर लगाम: आतिशबाजी और भारी सजावट पर होने वाले अनावश्यक खर्च को बचाना।

वक्त की पाबंदी: सादगीपूर्ण तरीके से समय पर रस्मों को पूरा करना।

समाज के लिए प्रेरणा

मानगो बस्ती में जब यह बारात पहुंची, तो स्थानीय लोगों ने इस पहल की जमकर सराहना की। लोगों का कहना है कि फिजूलखर्ची को रोककर उस पैसे का उपयोग शिक्षा या समाज के उत्थान में किया जा सकता है।

“यह सिर्फ एक निकाह नहीं, बल्कि समाज के लिए एक आईना है। अगर हर परिवार इसी तरह सादगी अपनाए, तो गरीब परिवारों पर शादी का बोझ कम होगा और एक स्वस्थ समाज का निर्माण होगा।” — इस्लाम अंसरी

इस बारात ने यह साबित कर दिया कि शादी की रौनक दिखावे में नहीं, बल्कि परंपराओं के सम्मान और आपसी दुआओं में होती है।

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