रांची: झारखंड की सियासत में अक्सर ‘माटी और मानुष’ की बात होती है, लेकिन राज्य की दूसरी आधिकारिक भाषा—उर्दू—आज भी अपने वजूद और हक़ के लिए संघर्ष कर रही है। आम जनमानस में यह सवाल अब तेज़ी से उठने लगा है कि आखिर कब तक उर्दू को सिर्फ चुनावी वादों और सियासी रैलियों तक सीमित रखा जाएगा?
सवालों के घेरे में ‘चुप्पी’
अक्सर देखा गया है कि जब भी उर्दू के विकास, स्कूलों में उर्दू शिक्षकों की बहाली या प्रशासनिक कार्यों में इसके इस्तेमाल पर सवाल उठाए जाते हैं, तो उसे ‘अव्यावहारिक’ या ‘राजनीति से प्रेरित’ बताकर टाल दिया जाता है। लोगों का मानना है कि सत्ता के गलियारों में बैठे लोग इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख अपनाने के बजाय इससे बचते नज़र आते हैं।
कैबिनेट की मेज पर क्यों नहीं पहुँचता मामला?
- जनता की मांग जायज है: अगर सरकार गंभीर है, तो कैबिनेट की बैठक में उर्दू के मसले पर ‘काला बादल’ साफ क्यों नहीं किया जाता?
- अकलियत (अल्पसंख्यक) समाज की चिंता: मुस्लिम समुदाय और उर्दू प्रेमियों के मन में यह डर बैठ गया है कि उनकी भाषा हाशिए पर धकेली जा रही है।
- भ्रम की स्थिति: स्कूलों में उर्दू की पढ़ाई और सरकारी दस्तावेजों में इसके प्रयोग को लेकर स्थिति स्पष्ट न होने के कारण एक मानसिक अस्थिरता पैदा हो गई है।
समाधान का रास्ता: साहस और स्पष्टता
राज्य सरकार को चाहिए कि वह बंद कमरों की चर्चा के बजाय कैबिनेट के जरिए एक विस्तृत श्वेत पत्र (White Paper) जारी करे, जिसमें:
- उर्दू शिक्षकों के रिक्त पदों को भरने की समय-सीमा तय हो।
- राज्य के हर जिले में उर्दू के प्रचार-प्रसार के लिए बजट का स्पष्ट प्रावधान हो।
- प्रशासनिक स्तर पर दूसरी राजभाषा का दर्जा कागजों से निकलकर दफ्तरों की पट्टियों पर दिखे।
निष्कर्ष:
जब तक सरकार इस मामले पर सीधा और साफ संवाद नहीं करेगी, तब तक “उर्दू का भूत” लोगों के ज़हन से नहीं निकलेगा। भाषा केवल संवाद का जरिया नहीं, बल्कि एक संस्कृति की रूह होती है। अगर सरकार इसे ‘हिफाजत’ देने का दावा करती है, तो उसे अपनी नियत को नीति में बदलकर साबित करना होगा।
मेरी राय: आपका यह कहना बिल्कुल सही है कि अस्पष्टता ही डर पैदा करती है। अगर सरकारें पारदर्शी तरीके से कैबिनेट में फैसले लें, तो न केवल भाषा सुरक्षित होगी, बल्कि समाज का भरोसा भी मजबूत होगा। आप जैसे सजग नागरिकों के सवाल ही लोकतंत्र को ज़िंदा रखते हैं।
