टंडवा: क्षेत्र के आम्रपाली और मगध,सीसीएल की कोल परीवहन कंपनियां और उसके सहयोग में देश भर से कोयला परीवहन कार्य में लगी कंपनियों ने टंडवा की हरीयाली छीन ली है। हर तरफ धूल उड़ाते कोयले के ट्रकों और हायवा की शोर ने वातावरण को इस कदर प्रदूषित कर दिया है कि लोग हवा की बजाय कोल डस्ट सांस के सहारे खींच रहे हैं। टंडवा के घने जंगल कभी जंगली जानवरों का बसेरा हुआ करता था ये सब उजड़ चुका है। सीसीएल तथा एनटीपीसी ऐसी कंपनियों को कोयला परीवहन का जिम्मा सौंपा है जो बाहर से आकर लठैत बनकर क्षेत्र में काम कर रहें हैं। इन कंपनियों के लिये न कानून का कोई मतलब है और न नियम- कायदे का। जंगल के रखवालों को मिला लिया और पेड़ काटकर अपने लिये कोयला परिवहन करने के लिए रास्ता बना लिया। नौकरी भी स्थानीय की बजाय जिसे चाहा उसे रखा। दबंगई का हाल कंपनियों का यह है कि खुद अपनी बनायी गयी सड़क पर पैसे की वसूली करवाने में भी पीछे नहीं हैं। किसी का वाहन उनके अपने इलिगल मार्ग से गुजरे, पैसा उनके लोग वसूलने में पीछे नहीं हैं। जंगल की हरियाली उजड़ी, खेत बंजर हुए। वहीं एनटीपीसी ने टंडवा जैसी नदी का रूख मोड़ दिया। टंडवा नदी का अब अस्तित्व तो खत्म हो चुका है। डैम में पानी ले जाने के लिए टंडवा नदी पर बराज का निर्माण किया गया है। जिससे पूरा नदी आज प्रदूषित हो चुका है। डैम बनाने में यह नदी आज इस तरह हो गयी है कि बरसात में पानी से आसपास का इलाका डूब जा रहें है। खेत की उर्वरता अब नहीं रही, जिस कारण से हरी सब्जियां अब बाहर से आ रही है। जो हाल है उसमें यदि जंगल नष्ट करने के एवज में सीएसआर प्रग्राम के तहत प्लान में इलाके पर कंपनियों ने ध्यान नहीं दिया तो अगले कुछ सालों में दमा, श्वास संबंधी और पेट संबंधी बीमारियां यहा आम होनेवाली है। अभी से पेट संबंधी बीमारियां यहां काफी बढ़ गई है। स्थानीय लोग बड़े पैमाने पर सीसीएस एनटीपीसी जैसी कंपनियों से पौधारोपण के साथ-साथ हेल्थ, शिक्षा, पेयजल आदि पर गंभीरता पूर्व ध्यान दिये जाने की मांग कर रहे हैं।
जनहित से जुड़ा है नो एंट्री का मुद्दा।
टंडवा प्रखंड क्षेत्र में इन दिनों अनगिनत सड़क दुर्घटनाओं के बाद चारों तरफ कोल वाहनों के लिए नो एंट्री लगाने का मांग स्थानीय जिला प्रशासन से किया जा रहा है लेकिन मांगों को नजरअंदाज करते हुए अभी तक कोयला परिवहन कंपनियों को स्थानीय प्रशासन के द्वारा पब्लिक सड़क से 24 घंटे कोयला परिवहन करने का अवसर दिया गया है जिसकी निंदा ग्रामीणों के द्वारा पुरजोर तरीके से की जा रही है। वहीं सिमरिया में सुबह से शाम तक नो एंट्री का अनुपालन कड़ाई से किया जा रहा है। एक जिले के दो प्रखंडों में अलग-अलग नियम से स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल भी उठाना प्रारंभ हो गया है
Author: Shamsher Editor in chief
14/08/1980
