जन शिकायत निवारण केंद्र में ट्रैफिक से जुड़े हुए भी कई मामले पहुंच रहे हैं। जिसमें बताया जा रहा है कि उनकी स्कूटी-बाइक का नंबर किसी दूसरे व्यक्ति ने लगा रखा है। ऐसे में जब भी वह शहर में कहीं ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करता है तो असली मालिक यानि उनके रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर व पते पर चालान की कॉपी पहुंच रही है। उनकी गाड़ी का नंबर किसी दूसरे व्यक्ति ने फर्जी तरीके से अपनी गाड़ी में लगा रखा है।
ट्रैफिक पुलिस से इसकी शिकायत की जा चुकी है, इसके बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। जन शिकायत निवारण केंद्र में मामला पहुंचने के बाद पुलिस ने जांच शुरू कर दी है। वहीं रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर पहुंचने वाले चालान की राशि को भी माफ करने का आश्वासन पीड़ित को दिया गया है। इसके लिए ट्रैफिक एसपी के नाम से आवेदन देने को कहा गया है।
इन 2 मामलों से समझिए… फर्जी नंबर प्लेट लगाने से कैसे बाइक के असली मालिक हैं परेशान
1. डोरंडा स्थित कुसई कॉलोनी निवासी राहुल कुमार की गाड़ी का नंबर जेएच 01 डीडी 6483 को कोई दूसरा व्यक्ति अपनी गाड़ी में लगाकर शहर का भ्रमण कर रहा है। चालान कटने के बाद फाइन की कॉपी राहुल कुमार के रजिस्टर्ड नंबर जेएच 01 डीडी 6483 के पते पर पहुंच रही है। चालान मिलने के बाद से राहुल परेशान हैं कि आखिर जब उनकी गाड़ी घर में लगी हुई है तो चालान कैसे कट रहा है। इसकी शिकायत ट्रैफिक पुलिस से की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। अब डोरंडा थाना परिसर स्थित जन शिकायत निवारण कैंप में न्याय की गुहार लगा रहे हैं। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने जांच शुरू कर दी है।
2. कांके रोड स्थित न्यू पुलिस लाइन कैंप में पहुंची मालती ने एसएसपी चंदन कुमार सिन्हा को बताया कि उनकी गाड़ी का नंबर प्लेट किसी ने फर्जी तरीके से अपनी गाड़ी में लगा रखा है। ऐसे में जब भी वह फर्जी व्यक्ति अपनी गाड़ी से ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन कर रहा है तो उनके पास चालान की कॉपी पहुंच रही है। चालान आने के बाद से वह काफी परेशान है। कई जगह शिकायत कर चुकी हैं, लेकिन कोई कुछ सुनने वाला नहीं है। एसएसपी ने पीड़िता को आश्वासन दिया है कि उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करेंगे। यह भी कहा है कि एक आवेदन दें, फर्जी तरीके से मिले सभी चालान कैंसिल होंगे।
बड़ा सवाल : क्या आम लोगों की सुरक्षा ऐसे ही करती है पुलिस
चोर-उचक्के ऐसा कर किसी आपराधिक घटना को अंजाम दे सकते हैं। इसलिए पुलिस के पास शिकायत पहुंचते ही तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए थी, जो नहीं की गई। इसमें थाना स्तर पर कार्रवाई नहीं होना कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है। अब जब मामला बड़े अधिकारियों के पास पहुंचा है तो आश्वासन दिया जा रहा है। क्या पुलिस ऐसे ही आम लोगों की सुरक्षा से खिलवाड़ करती है?
